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संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने कुप्पाघाट, भागलपुर की गुफा में दृढ़ ध्यानाभ्यास करके आत्मज्ञान प्राप्त किया । उनकी साधना-मर्म का साक्षात्कार उनकी मौलिक रचनाओं और उनके प्रवचनों में मिलता है । उनके जीवन, साहित्य और साधना के विवेचन से स्पष्ट होता है कि उनका जीवन एक सन्त का जीवन रहा है, जो सारग्राही होता है और लोक जीवन को अपनी साधना, आचरण तथा विचार से उपकृत करने की चेष्टा करता है ।

समय गया फिरता नहीं, झटहिं करो निज काम |
जो बिता सो बीतिया, अबहु गहो गुरु नाम ||
सन्तमता बिनु गति नहीं, सुनो सकल दे कान |
जौं चाहो उद्धार को, बनो सन्त-संतान ||
‘मेँहीँ’ मेँहीँ भेद यह, सन्तमता कर गाइ |
सबको दियो सुनाई के, अब तू रहे चुपाई ||

सब सन्तन्ह की बड़ि बलिहारी

तुलसी प्यास तौ बूझै प्यार से, चढ़ घर अधर समाइ । किरपावन्त सन्त समुझावैं, और न लगै उपाइ ।। >>आगे पढ़े

सन्तमत की शिक्षा में वास्तविक मुत्तिफ़ उस ईश्वरीय देन का नाम है कि जो सुख और दुःख दोनों से पृथक् है । >>आगे पढ़े

प्रथमहिं धारो गुरु को ध्यान |
हो श्रुति निर्मल हो बिंदु ज्ञान… >>आगे पढ़े

धर्मप्रेमियों उठो ए सत्संगियों जागो, है मिटाना | जीव का योनि में आना-जाना >>आगे पढ़े

अंधकार में जीवन पड़ाहुआ है प्रकाश में चलें | हमारे आप के अन्दर सिर्फ अंधकार ही नहीं है – प्रकाश भी है >>आगे पढ़े