सन्तमत

परम संत बाबा देवी साहब

‘‘सन्तमत किसी नवीन पन्थ या मत का नाम नहीं है; किन्तु वह एक सनातन सुगम मार्ग है, जो सब में होता हुआ भी सबसे न्यारा है । न तो उसपर चलने के हेतु किसी को अपना मत परिवर्तन करने आवश्यकता है और न अपना पंथ छोड़ने की । गृहस्थ अथवा विरक्त, युवा अथवा वृद्ध, किसी भी अवस्था में विद्यमान प्रत्येक मत, देश, जाति, रंग और वंश के स्त्री-पुरुषों को उस पर चलने का अधिकार है; क्योंकि वह किसी मनुष्य का बनाया हुआ नहीं है । किन्तु प्रत्येक मनुष्य को सतपुरुष सद्गुरु दयाल की ओर से मिला हुआ है, इसी कारण महात्मा कबीर, नानक, दादू, पलटू इत्यादि सब महापुरुषों ने जो उस पर चलकर भवसागर से पार हुए, उसपर केवल अपना चलना ही प्रकट किया है, न कि बनाना’’

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक

‘‘सारे मोक्ष-धर्म के मूल भूत अध्यात्म-ज्ञान की परम्परा हमारे यहाँ उपनिषदों से लगाकर ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास, कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, इत्यादि साधु पुरुषों तक अव्याहत चली आ रही है’’।

‘‘हिन्दी सन्त साहित्य भारतीय साहित्य की अमूल्य निधि है । इस साहित्य के अधिकांश रचनाकार सामान्य जन-समाज के भीतर से आये हुए थे, इसलिये इसमें साधारण जन की आशा-निराशा, हर्ष-विषाद, राग-विराग आदि के स्वर स्पष्ट रूप में सुनाई पड़ते हैं । भारतीय जीवन को अन्धविश्वास, कर्मकाण्ड एवं परंपरा बद्ध संस्कारों से मुक्त कर उसकी अपरिमित सम्भावनाओं का द्वार खोलने का स्तुत्य कार्य इन सन्तों की वाणियों द्वारा हुआ है, इसीलिए निस्सन्देह कहा जा सकता है कि सन्तों की वाणियाँ जीवित मशालें हैं । इस सन्त-वाणी रूपिणी भागीरथी की अवधारणा में ज्ञात-अज्ञात अनेक व्यक्तियों, शास्त्रों, साधना-सम्प्रदायों एवं चिन्तन धाराओं का योग रहा है । निभ्रान्तरूप से कहा जा सकता है कि भारतीय चिन्तन एवं साधना का सार-संचयन हिन्दी सन्त साहित्य में वर्तमान है । ‘सार-सार’ को गह कर ‘थोथा’ को उड़ा देने की सन्त-प्रवृत्ति के कारण ही यह संचयन-कार्य सम्भव हो सका है | ’’ [डाॅ० महेश्वर प्रसाद सिंह / सन्त कवि मेँहीँ: व्यक्तित्व और कृतित्व]

‘‘ये सन्त भारत में कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक एवं कच्छ से लेकर कोहिमा तक अपनी पावन साधना का मांगलिक प्रसाद बाँटते रहे । आठ सौ वर्षों से इन्होंने भारतीय जीवन को प्रेरित-प्रभावित किया । इस साधना-मार्ग पर अग्रसर होनेवाले सन्त, अन्त्यज से लेकर ब्राह्मण एवं गृहस्थ से लेकर वैरागी तक थे । अनेक सन्त तो यवन जाति के थे । इनका उद्देश्य ही ‘जाति-पाँति’ के घेरे को तोड़कर हरि-भजन करने का था । अनेक सन्त सिंह और सपूत की तरह अकेले चलने के समर्थक थे, पर कई ऐसे भी थे, जो जमात बाँधकर चलते थे । अधिकतर सन्त एकान्त भाव से हरि-भजन में लीन रहते थे, पर कुछ ऐसे भी थे, जो सामाजिक एवं राजनीतिक न्याय के लिये तलवार उठाने में भी नहीं झिझकते थे । कुछ ‘चना चबेना गंगजल’ से सन्तुष्ट रहनेवाले थे, तो कुछ सामूहिक रूप से व्यावसायिक संगठन के पक्षधर थे । इस प्रकार विपुल क्षेत्र एवं विस्तृत काल-खण्ड में प्रचारित इस साहित्य में यद्यपि अनेक प्रकार की भिन्नताएँ थीं, फिर भी इसमें विषय, साधना-पद्धति एवं भिव्यक्ति-शिल्प की जो अद्भुत समानता पाई गई है, वह ध्यातव्य है’’ (वही /पृ०-१-२)।

                ‘‘इन सन्तों ने विशाल साहित्य की रचना की है । लगभग आठ सौ वर्षों की इस सन्त-परम्परा को पं० परशुराम चतुर्वेदी ने जयदेव से लेकर महात्मा गाँधी तक विस्तृत माना है । डाॅ० बड़थ्वाल ने जयदेव से लेकर शिवदयाल तक के बाईस सन्तों का विवेचन किया है। उन्होंने प्रायः उन्हीं सन्तों का विवेचन किया है, जिन्होंने या तो प्रारम्भिक संतमत के लिये भूमिका प्रस्तुत की, उसके सिद्धान्तों की रचना की या आगे चलकर किसी सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया । पं० रामचन्द्र शुक्ल ने सर्वप्रथम निर्गुणमार्गी ज्ञानाश्रयी कवियों का व्यवस्थित विवरण प्रस्तुत किया । इनमें उन्होंने कबीर, दादू और गुरु नानक को प्रमुख माना । अन्य सन्तों का विवेचन केवल संदर्भ रूप में किया । पं० परशुराम चतुर्वेदी के वचन में किंचित सुधार कर ऐसा कहा जा सकता है कि सन्त परम्परा जयदेव से लेकर सन्त मेँहीँ, उनके शिष्यों एवं अन्य सम्प्रदाय के शिष्य-प्रशिष्यों तक फैली हुई है । अनेक सम्प्रदाय-उपसम्प्रदायों के रूप मंे अब भी यह जीवित है और साहित्य तथा साधना का मार्ग प्रशस्त कर रही है’’ (वही / पृ०-११) ।

                सन्त साहित्य की विशाल की परम्परा को हिन्दी साहित्य के इतिहास का अभिन्न अंग मानकर कई काल-खण्डों में विभाजित करके विवेचित करने का प्रयास किया गया है । सर्वप्रथम पं० परशुराम चतुर्वेदी ने सन्त साहित्य का काल-विभाजन प्रस्तुत करते हुए उसे चार कालों में बाँटा है:-

१. प्रारम्भिक युग-संवत् १२०० से १५५० तक

२. मध्य युग (पूर्वार्द्ध)-सवंत् १५५० से १७०० तक

३. मध्य युग (उत्तरार्द्ध)- संवत् १७०० से १८५० तक

४. आधुनिक युग- सवंत् १७५० से महात्मा गाँधी तक

                प्रारम्भिक युग को सन्त-साहित्य का प्रस्तावना एवं स्थापना का काल कहा जा सकता है । इस युग में उत्तर के लालदेव, पूर्व के जयदेव, पश्चिम के सधना एवं वेणी तथा दक्षिण के नामदेव ने मिलकर सन्तमत के प्रादुर्भाव के लिये भूमि प्रस्तुत कर दी और कबीर, रैदास, धन्ना, सेननाई, पीपा आदि सन्तमत के प्रतिष्ठापक हुए । इन दोनों के बीच स्वामी रामानन्द हुए जिन्होंने प्रस्तावकों द्वारा प्रस्तुत भूमि में सन्तमत का बीज डाल दिया, जिससे उत्पन्न पौधे का सिंचन, संस्कार आदि प्रतिष्ठापकों द्वारा सम्पन्न हुआ । इस तरह कबीर और उनके सम कालिन सन्तों ने अपने प्रयास से सन्तमत को प्रतिष्ठित कर दिया ।

                स्वामी रामानन्द का स्थान भारतीय सन्त परम्परा में अन्यतम है । आज जिस भक्ति-साधना का प्रचार उत्तर भारत में दिखाई पड़ रहा है, उसके प्रवत्र्तक स्वामी रामानन्द ही थे । इनके शिष्यों में सर्व प्रमुख संत कबीर ही थे । सन्तमत का प्रारम्भ वस्तुतः कबीर से ही माना जा सकता है’’  (वही / पृ०-१४-१६) ।

                प्रारम्भिक युग में सन्तमत का स्वरूप कुछ स्पष्ट हो चला था । उसकी साधना-प्रणाली एवं विचार-धारा की रूपरेखाएँ भी प्रकट हो चली थीं । अभी तक साहित्य, साधना-प्रणाली एवं विचार-धारा की रूढ़ियाँ नहीं बनीं थीं । सम्प्रदाय के संगठन का प्रश्न इनमें से किसी सन्त के मन में नहीं आया था । अभी तक सन्त स्वयं ही अपने विचारों का प्रचार करते थे । उसके लिये कोई संगठित दल नहीं था । कबीर के जीवन-काल में न तो कबीर-पंथ और न किसी अन्य पंथ का ही संगठन हुआ । इस प्रवृत्ति का प्रारम्भ कबीर के देहावसान के उपरान्त हुआ ।

                इन प्रारम्भिक सन्तों की विस्तृत शिष्य-परम्परा थी । गुरु के देहावसान के उपरान्त उनके शिष्य-प्रशिष्यों में गुरु-वचनों को प्रमाण मानने एवं उनके चरणों को पूजने की आकांक्षा स्वाभाविक रूप से जन्म लेेने लगी । इनमें से अनेक शिष्यों ने दूर-दूर तक गुरु तथा अपने सिद्धान्तों को प्रचारित करना चाहा एवं अपनं अनुयायियों की संख्या में वृद्धि करनी चाहीं । इसके अलावा अपने योग्य शिष्यों को उत्तराधिकारी नियुक्त कर अपने विचारों को जीवित और निष्कलंक रखने की कामना भी इनके मन में जगी । इन कारणों से अपने गुरु के नाम या सिद्धान्त के आधार पर शिष्यों एवं अनुयायियों को संगठित करने की प्रवृत्ति उत्पन्न हुई और अन्ततः यही प्रवृत्ति अनेक पंथों, उपपंथों के संगठन का कारण बनी ।

                पंथ-निर्माण की यह प्रवृत्ति मध्यकालीन (पूर्व मध्यकाल) सन्तमत की प्रमुख विशेषता मानी जाती है । इस युग में अनेक पंथों की स्थापना हुई । ये पंथ मुख्यतः भारत के पश्चिमी प्रदेशों में ही स्थापित हुए । उन दिनों इन प्रदेशों का वातावरण धार्मिक उथल-पुथल से आक्रान्त था । इसलिये फुटकल रूप से सन्तगण अपने को उस वातावरण में प्रतिष्ठित कर पाना असम्भव देख रहे थे । इस कारण इन प्रदेशों में पंथ-संगठन का काम तेजी से हुआ । गुरु नानक के अनुयायियों ने नानक पंथ की स्थापना की और राजस्थान में सं० १५५० के पहले ही सन्त जंभनाथ ने बीकानेर में ‘साध-सम्प्रदाय’ का प्रवत्र्तन किया । इसी के कारण लगभग स्वामी हरिदास के नेतृत्व में ‘निरंजनी-सम्प्रदाय’ का संगठन हुआ । मध्य प्रान्त के सन्त सिंगा जी ने भी लगभग इसी समय अपने सम्प्रदाय की स्थापना की । इसी बीच किसी समय ‘कबीर-पंथ’ भी संगठित हुआ । यह निश्चयात्मक रूप से कह सकना सम्भव नहीं है कि सर्वप्रथम किस सम्प्रदाय की स्थापना हुई । इसी काल में दादू-पंथ, लाल-पंथ, बावरी-पंथ एवं मलूकदासी सम्प्रदाय की भी स्थापना हुई  (वही / पृ०-२०)।

       वस्तुतः कबीर के प्रमुख शिष्यों ने सन्तमत का प्रचार किया था, कबीर-पंथ का नहीं । कबीर दास जैसे परम्परा भंजक से किसी सम्प्रदाय के संगठन की आशा करना अनुचित है । किन्तु कबीर के निर्वाण प्राप्त करने उपरान्त इनके शिष्यों में उपर्युक्त सभी प्रवृत्तियों के दर्शन होने लगे (वही / पृ०-२२-२३)। कालान्तर में कबीर-पंथ में वे सभी विकृतियाँ प्रवेश कर गईं, जिनके प्रति कबीर ने विरोध प्रकट किया था । इनके सहज धर्म का रूप बाह्याचारों में डूब गया (वही / पृ०-२४)।

       इस प्रकार पूर्व मध्यकाल की सन्त प्रवृत्ति का विश्लेषण करने से पता चलता है कि कबीर के पूर्ववर्ती सन्तों ने सन्तमत के लिये वातावरण तैयार किया और बीजरूप में उसके सिद्धान्त निरूपित किये । कबीर और उनके समकालीन सन्तों ने साधना एवं विचारधारा के रूप में सन्तमत की प्रतिष्ठा की । किन्तु कबीर एवं अन्य प्रमुख सन्तों के तिरोभाव के साथ ही पंथ-निर्माण की प्रवृत्ति का प्रादुर्भाव हो गया ।

       उत्तर मध्यकाल (संवत् १७००-१८५०) में जिन पंथों का प्रादुर्भाव हुआ, वे हैं- बाबालाली, प्रणामी, सत्तनामी, धरनाश्वरी, रामस्नेही, शिवनारायणी, चरनदासी और सरभंगी । रविमाण, सम्प्रदाय, पानप-पंथ एवं गरीब-पंथ का विकास भी इसी काल में हुआ । इन सम्प्रदायों में साधना एवं विचारधारा की दृष्टि से सन्तमत की मूल भावना सुरक्षित है (वही / पृ०-२८-२९)।

       उत्तर मध्यकाल तक सन्त-सम्प्रदाय पूर्णतः प्रतिष्ठित ही नहीं हो गये थे, वरन् इनकी परम्पराएँ भी बनने लगी थीं । रूढ़ियों के बन जाने के उपरान्त सम्प्रदायों के अलग-अलग कटघरे बन गये थे । इस युग के कुछ प्रबुद्ध सन्तों ने इस दीवार की उपस्थिति को अनुभव किया । उन्होंने यह भी देखा कि सन्त समाज की अन्य समस्याओं से पूरी तरह कट-से गये हैं । आर्थिक सामाजिक एवं राजनीतिक परिस्थितियों से वे पूरी तरह अनासक्त हैं और धार्मिक विषमताओं के प्रति भी वे प्रायः वीतराग हैं । इस स्थिति का आकलन करने के उपरान्त सन्तों ने विभिन्न सम्प्रदायों के बीच समन्वय का कार्य शुरू किया । उन्हें विभिन्न सम्प्रदायों के सिद्धान्तों की परीक्षा करने पर ऐसा लगा कि उनमें समानता प्रचुर मात्रा में है । विषमता मुख्यतः बाह्याचार में ही है । अतः सभी सम्प्रदाय एवं धर्मों की मूलभूत एकता के सूत्र को पकड़कर वैमनस्य एवं संघर्ष की परिस्थिति पैदा करनेवाले वैषम्य का उन्होंने तिरस्कार करने का निश्चय किया (वही / पृ०-३२)।

       इस युग में समन्वय को शास्त्रीय आधार देने के लिये सन्तों ने दूसरे धर्मों की पुस्तकों को पढ़ना एवं अन्य शास्त्रीय ग्रंथों का अवलोकन करना भी शुरू कर दिया । इस युग में पूर्व मध्य काल के सन्तांे के अपने-अपने ग्रंथ मान्य हुए । कबीर पंथ ने ‘बीजक’, सिक्ख-सम्प्रदाय में ‘आदि-ग्रंथ’, साध-सम्प्रदाय में ‘आदिउपदेश’, दादू-पंथ में ‘अंग बंधू’, प्राणनाथी सम्प्रदाय में ‘कुलजमे शरीफ’ और शिवनारायणी सम्प्रदाय में ‘गुरु अन्यास’ पवित्र ग्रंथ के रूप में पुजित होने लगे (वही / पृ०-३३)।

सन्त साहित्य का आधुनिक काल विक्रम् संवत् १८५० से अद्यावधि विस्तृत है । इस काल में मुख्यतः सहिब-पंथ, नांगी सम्प्रदाय, राधास्वामी सत्संग एवं सन्तमत-सत्संग जैसे सन्त-सम्प्रदाय संगठित हुए । इस काल को आधुनिक काल कहने के पीछे निश्चय ही कुछ कारण है ।

                आधुनिक काल में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में मध्यकालीन संस्कारों के स्थान पर नवीन दृष्टिकोण का प्रभाव बढ़ा । सन्तमत में भी नवीन प्रवृतियाँ स्पष्ट हुईं । इसके पीछे यूरोपीय विद्वानों का हाथ था । उन्होंने भारतीय दर्शन, साहित्य, कला, संस्कृति आदि का तटस्थ दृष्टि से विवेचन एवं मूल्यांकन किया । आगे चलकर भारतीय विद्वानों ने भी यह कार्य किया और नये सिरे से सन्तमत की साधना एवं विचारधारा की भी समीक्षा शुरू हुई । (वही / पृ०-३४)।

                इस युग के विचारकों जैसे महर्षि दयानन्द, राजाराम मोहन राय आदि ने सामाजिक, धार्मिक क्षेत्रों मंे सुधार का शुत्रपात किया । इस प्रवृत्ति का असर सन्तों पर भी हुआ और नांगी सम्प्रदाय के प्रवत्र्तक सन्त डेढ़राज ने पुरुषों एवं स्त्रियों के समान आधार का समर्थन किया । इन सन्तों में राधास्वामी मत के दयालबाग शाखा के प्रवत्र्तक सन्त आनन्दस्वरूप ने उद्योग धंधे की शुरूआत की और जूता बनाना जैसा ‘ओछा’ काम भी सत्संग के साथ संयुक्त कर दिया । इस प्रकार आधुनिक युग में आकर सन्तगण भी जीवन के बँधे-बँधाये चैखटों से बाह्य जीवन को विविध रूपों स्वीकार करते हुए साधना के मूल स्वरूप को बनाये रखने में सक्षम हुए (वही / पृ०-३५)।

                आधुनिक काल में सन्त तुलसी साहब (हाथरसी) ने ‘सन्तमत’ का प्रचार किया । तुलसी साहब ने अपने मत को ‘सन्तमत’ कहा है । इन्होंने अपने मत को सभी सन्तों का मत माना और किसी नये पंथ का प्रारम्भ नहीं किया । विभिन्न सन्तों का विवरण देते हुए इन्होंने बताया है कि उनके परवत्र्ती शिष्यों एवं अनुयायियों ने किस प्रकार उनके मतों को भ्रष्ट कर दिया । इस प्रकार उन्होंने इस बात का प्रयास किया कि सन्तों के मतों के भीतर की एकता को स्थापित किया जाय और अनावश्यक भेद-उपभेदों का बहिष्कार किया जाय (वही / पृ०-३६)।