सन्तमत-सत्संग

सद्गुरु महर्षि मेँहीँ

मध्य कालीन सन्तों की महती साधना को नवयुग के द्वार तक लाने का श्रेय सन्त सद्गुरु महर्षि मेँहीँ को जाता है | उन्हें आठ सौ वर्षों से प्रचलित सन्त-परम्परा का दाय मिला | इन्होंने बड़े कौशल से इस दाय को दायित्व के रूप में सम्भाला और अपनी अनुभूतियों एवं साधना से पुरस्सर कर पुन: उसे समाज एवं सन्त-सेवियों को समर्पित कर दिया |

इस प्रकार एकान्तिक साधना एवं सामाजिक दायित्व दोनों का अद्भुत संयोग इनके व्यक्तित्व एवं इनके सन्तमत-सत्संग में दिखाई पड़ता है |

    संत सद्गुरु महर्षि मेँहीँ परमहंस जी महाराज ने कुप्पाघाट, भागलपुर की गुफा में दृढ़ ध्यानाभ्यास करके आत्मज्ञान प्राप्त किया । उनकी साधना-मर्म का साक्षात्कार उनकी मौलिक रचनाओं और उनके प्रवचनों में मिलता है । उनके जीवन, साहित्य और साधना के विवेचन से स्पष्ट होता है कि उनका जीवन एक सन्त का जीवन रहा है, जो सारग्राही होता है और लोक जीवन को अपनी साधना, आचरण तथा विचार से उपकृत करने की चेष्टा करता है ।

सद्गुरु महर्षि मेँहीँ सन्तों की उस उत्तरवर्ती पीढ़ी के प्रतीक हैं, जो परम्परा और शास्त्र के सारतत्त्व युक्त रिक्थ को ग्रहण कर उसे अपने चिन्तन, साधना और अनुभूति से संवलित करके परवर्ती पीढ़ी को पैतृक दाय के रूप में प्रदान कर जाती है, ताकि वह उस माशाल को जलाये रख सके, जो अंधकार से प्रकाश की ओर जाने के मार्ग की निर्देशिका होती है । (डाॅ0 महेश्वर प्रसाद सिंह, सन्त कवि मेँहीँ: व्यक्तित्व और कृतित्व)

    उन्होंने सन्तों के परम कल्याणकारी ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के उद्देश्य से संतमत- सत्संग के नाम से अखिल भारतीय स्तर की महासभा बनाकर उसका निबंधन कराया जिसके अधीन प्रान्तीय, जिला, अनुमंडल आदि स्तर की समितियाँ प्रचार-प्रसार कार्य को संस्थागत रूप में संचालित कर रही है ।
सद्गुरु महर्षि मेँहीँ ने सन्तों के ज्ञान को संश्लिष्ट रूप देकर संतमत का प्ररम्परापोषित नवीन दार्शनिक आधार बनाया । उन्होंने मोटी और बाहरी बातों को तथा पंथाई भावों की पहचान के लिये सद्ग्रंथों एवं संत-वाणियों को योगानुभूति की मथनी से मथकर सार विचारों की अभूतपूर्व शृंखला बनायी । मानस-जप, मानस-ध्यान, दृष्टि-योग तथा सुरत-शब्दयोग- ये मोक्ष मार्ग के चार पायदान बनें । इनमें से प्रथम दो तक स्थूल-ध्यान या मोटी भक्ति मानी गयी । यहीं तक पंथ-पंथाई भावों का प्राधान्य रहता है । दृष्टि-योग और सूरत-शब्द-योग या नादानुसंधान को सूक्ष्म भक्ति मानी गयी, जहाँ पंथ-पंथाई भाव विगलित हो जाते हैं । मोक्ष मार्गी के लिये सदाचार की पाँच सीमाएँ बनीं- ‘‘व्यभिचार चोरी नशा हिंसा झूठ तजना चाहिये’’|

    आत्मानुभूति जन्य प्रामाणिक तथ्यों के समर्थन में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ ने वेदों, उपनिषदों, रामायण, महाभारत, सन्त-वाणियों से ज्ञान-योग-युक्त मोक्ष सम्बंधी विचार-साम्य का पिष्ट-पेषण किया । उनकी टीका या भाष्य का लक्ष्य अनुभवजन्य ज्ञान की सम्पुष्टि में परम्पराओं की तलाश रहा तथा वेद-वेदान्त का ज्ञान और संतों की वाणी के विचार-साम्य को उद्घाटित करना रहा ।
सत्संग-योग (चारो भाग) की भूमिका में सद्गुरु महर्षि मेँहीँ ने अपना मंतव्य व्यक्त किया है- ‘‘ईश्वर-भक्ति का और मोक्ष का, इनमें एक ही साधन ज्ञान तथा योग-युक्त भक्ति है । प्रथम तीनों भागों का उत्तम मनन करने पर वेद- वेदान्त में और सन्तों के मत में मोक्षधर्म-सम्बंधी विचारों का तथा साधना-मार्ग की पूर्ण एकता का उत्तम निर्णय हो जाता है ।
कहा जा सकता है कि ‘मोक्ष-दर्शन’ की दार्शनिक पृष्ठ-भूमि ही सद्गुरु महर्षि मेँहीँ के द्वारा स्थापित ‘संमत-सत्संग’ का मूल दिशा-स्तम्भ है । अपने मूल स्वरूप में यह अपने पूर्ववर्ती पीढ़ी के मूलभूत अध्यात्म ज्ञान की परम्परा का समुचित विकास है लेकिन एक जगह इसका इतना सिलसिलेवार ढाँचा और संश्लिष्ट रूप कहीं संतमत के इतिवृत में नहीं मिलता । उनके चिंतन, मनन और निदिध्यासन का सार है- मोक्ष-दर्शन (सत्संग-योग, चतुर्थ भाग) और महर्षि मेँहीँ पदावली ।

सन्तमत के उपर्युक्त सिद्धान्त एवं परिभाषा के अनुरूप सद्गुरु महर्षि मेँहीँ ने सन्तमत-सत्संग का स्पष्ट आधारभूत दार्शनिक पृष्ठभूमि तैयार कर सत्संग-योग के चौथे भाग में सिलसिलेवार रूप में प्रकाशित करवाया | इसमें सृष्टि के विकास से लेकर ईश्वर के स्वरुप का निर्धारण तथा उसकी प्राप्ति के सम्पूर्ण साधनों का सांगोपांग परम्परापोषित विचारों की शृंखला मिलती है, जो सद्गुरु महर्षि मेँहीँ के चिंतन, मनन, निदिध्यासन से प्राप्त अनुभवजन्य ज्ञान का संश्लिष्ट रूप है |